G-Z76GJ3VQ65 google-site-verification=W_bCfRqm-7eEfZBB6vSer72kEdpHDdfo3Yo0LPoPog0 तालिबान विदेश मंत्री का भारत दौरा: क्यों अहम था देवबंद का पड़ाव? - BAHORA NEWS

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तालिबान विदेश मंत्री का भारत दौरा: क्यों अहम था देवबंद का पड़ाव?

 

अमीर खान मुत्ताकी देवबंद दौरे पर – Darul Uloom Deoband Visit 2025”
Image credit :-Amir Khan Muttaqi instagram handle 

🌍 तालिबान विदेश मंत्री की भारत यात्रा: आखिर क्यों था यूपी का देवबंद उनके दौरे का अहम हिस्सा?


🕊️ नई दिल्ली से देवबंद तक — एक ऐतिहासिक और कूटनीतिक सफर

अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी इन दिनों भारत दौरे पर हैं।
यह यात्रा लगभग सात दिनों की है, जिसका उद्देश्य भारत और अफगानिस्तान के बीच क्षेत्रीय और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना बताया जा रहा है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि मुत्ताकी अपने भारत दौरे के दौरान उत्तर प्रदेश के देवबंद स्थित ऐतिहासिक इस्लामिक संस्था “दारुल उलूम देवबंद” का भी दौरा करने वाले हैं।
यह वही संस्था है, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी शिक्षा और विचारधारा की एक गहरी परंपरा बनाई — और जिसकी वैचारिक जड़ें तालिबान के गठन तक पहुंचती हैं।


🕌 देवबंद की ऐतिहासिक अहमियत

दारुल उलूम देवबंद की स्थापना वर्ष 1866 में ब्रिटिश शासन के दौर में हुई थी।
इस संस्था ने दक्षिण एशिया में इस्लामी शिक्षा, समाज सुधार और धार्मिक पहचान को नई दिशा दी।
यहीं से निकली देवबंदी विचारधारा ने बाद में पाकिस्तान और अफगानिस्तान में कई इस्लामी संस्थानों को प्रभावित किया।

इसी विचारधारा के आधार पर पाकिस्तान के दारुल उलूम हक्कानिया (Darul Uloom Haqqania) की स्थापना की गई,
जहां से कई वरिष्ठ तालिबान कमांडर और धार्मिक नेता शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं।
इस संस्थान के संस्थापक मौलाना अब्दुल हक स्वयं देवबंद से पढ़े और वहीं अध्यापन भी किया था।
बाद में उनके बेटे मौलाना सामी-उल-हक को “Father of the Taliban” कहा जाने लगा,
क्योंकि उनकी संस्था ने तालिबान आंदोलन की विचारधारा को आकार देने में प्रमुख भूमिका निभाई।


🤝 भारत और तालिबान के बीच संवाद की नई शुरुआत

भारत और तालिबान के रिश्ते लंबे समय तक जटिल रहे हैं।
लेकिन पिछले एक वर्ष में धीरे-धीरे “बैक-चैनल कूटनीति” (Backchannel Diplomacy) के ज़रिए संपर्क बढ़ा है।

कुछ महीने पहले भारत के विदेश सचिव विक्रांत मिस्री ने काबुल में मुत्ताकी से मुलाकात की थी।
इसके अलावा, अफगानिस्तान के डिप्टी मिनिस्टर ऑफ मेडिसिन एंड फूड, हमदुल्लाह जाहिद भी हाल ही में भारत के एक अंतरराष्ट्रीय हेल्थकेयर सम्मेलन में शामिल हुए थे।

इन मुलाकातों से साफ है कि भारत, तालिबान शासन से दूरी बनाकर नहीं, बल्कि “संतुलित संवाद” की नीति अपनाना चाहता है —
ताकि दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता बनी रहे।


🚗 देवबंद यात्रा का कार्यक्रम

सूत्रों के अनुसार, तालिबान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी शनिवार सुबह 10:30 बजे सड़क मार्ग से देवबंद पहुंचेंगे।
वह वहां करीब पांच घंटे तक रुकेंगे और दारुल उलूम परिसर का दौरा करेंगे।

मुत्ताकी की मुलाकात दारुल उलूम के प्रमुख मुफ़्ती अबुल कासिम नोमानी और जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी से होने की संभावना है।
वे संस्था के शिक्षकों और विद्वानों से भी संवाद करेंगे।

यह यात्रा केवल एक “धार्मिक सम्मान” नहीं, बल्कि एक “राजनयिक संकेत” भी मानी जा रही है —
क्योंकि देवबंद का नाम तालिबान की वैचारिक जड़ों से सीधे जुड़ा हुआ है।


🧭 क्यों महत्वपूर्ण है देवबंद तालिबान के लिए?

तालिबान की वैचारिक नींव “देवबंदी विचारधारा” पर आधारित है।
पाकिस्तान के हक्कानिया मदरसे से लेकर अफगानिस्तान की मस्जिदों तक,
देवबंद की शिक्षाओं का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है।

  • हक्कानिया मदरसे के संस्थापक अब्दुल हक देवबंद में पढ़े थे।

  • उनके बेटे सामी-उल-हक ने तालिबान के कई शीर्ष नेताओं को शिक्षा दी।

  • तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर और कई मंत्री इसी विचारधारा से जुड़े रहे।

इसलिए मुत्ताकी का देवबंद दौरा एक “प्रतीकात्मक वापसी” है —
जिससे तालिबान अपने आदर्श स्रोत को सम्मान दे रहा है और भारत के साथ संवाद का नया अध्याय खोलना चाहता है।


🏛️ कूटनीतिक दृष्टि से क्या मतलब है इस यात्रा का?

भारत ने अभी तक तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता (Formal Recognition) नहीं दी है,
लेकिन यह यात्रा इस दिशा में “Soft Diplomacy” का संकेत है।

इसका उद्देश्य है —

  • अफगानिस्तान में भारत की रणनीतिक उपस्थिति बनाए रखना

  • तालिबान शासन से सुरक्षा और मानवीय सहायता पर चर्चा

  • भारत की निवेश परियोजनाओं (Infrastructure Projects) को फिर से शुरू करने की संभावना तलाशना

भारत, अफगानिस्तान के लोगों से सदियों से सांस्कृतिक रूप से जुड़ा है।
इसलिए यह यात्रा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संस्कृति और विश्वास का प्रतीक भी है।


🏰 ताजमहल और दिल्ली बैठकें भी एजेंडे में

देवबंद यात्रा के बाद मुत्ताकी 12 अक्टूबर को आगरा जाएंगे,
जहां वे विश्व प्रसिद्ध ताजमहल का भ्रमण करेंगे।

इसके बाद दिल्ली में भारतीय उद्योग जगत (Business Leaders) के साथ एक बैठक में शामिल होंगे,
जिसका आयोजन एक प्रमुख चेंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा किया जा रहा है।
इसमें भारत-अफगानिस्तान के व्यापारिक रिश्तों को बढ़ाने के मुद्दों पर चर्चा होगी।


⚖️ यूएनएससी की अनुमति के बाद ही संभव हुआ दौरा

मुत्ताकी की यह यात्रा पहले तय थी,
लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) द्वारा लगाए गए यात्रा प्रतिबंध (Travel Ban) के कारण इसे रोका गया था।
हाल ही में भारत के विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की कि
यूएनएससी कमिटी ने मुत्ताकी को अस्थायी यात्रा छूट (Travel Ban Exemption) दे दी है,
जिसके बाद यह ऐतिहासिक दौरा संभव हुआ।


🧩 भारत के लिए इस यात्रा का भविष्य क्या संकेत देता है?

भारत के लिए यह एक कूटनीतिक परीक्षा भी है।
एक ओर भारत वैश्विक मंच पर “आतंकवाद विरोधी नीतियों” का समर्थन करता है,
वहीं दूसरी ओर उसे अफगानिस्तान में अपनी राजनयिक उपस्थिति और रणनीतिक हितों को भी बनाए रखना है।

देवबंद यात्रा को इसलिए “Balance of Diplomacy” कहा जा रहा है —
जहां भारत ने एक वैचारिक स्थल को संवाद का मंच बनाया है।

यह कदम भविष्य में दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, आर्थिक और शिक्षा सहयोग की दिशा में रास्ता खोल सकता है।


📚 निष्कर्ष: प्रतीक, राजनीति और संवाद का संगम

अमीर खान मुत्ताकी का देवबंद दौरा सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं,
बल्कि एक राजनयिक संदेश है —
कि दक्षिण एशिया में संवाद, परंपरा और सहयोग की नई भाषा तैयार हो रही है।

देवबंद की धरती से शुरू हुआ यह संवाद, शायद आने वाले समय में
भारत और अफगानिस्तान के रिश्तों को एक नई स्थिरता और समझ प्रदान करे।

Writer -Ritesh yadav 

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