17 महीनों से बिना मानदेय काम कर रहीं गोदाम की दीदियां – भूखे पेट ‘अन्न योजना’ की हकीकत उजागर
🌾 धरातल पर सरकारी दावे फेल – 17 माह से नहीं मिला मानदेय
गढ़वा जिले के धुरकी प्रखंड के परासपानी गांव की तारा महिला विकास समिति की दीदियां, जो जेएसएलपीएस (Jharkhand State Livelihood Promotion Society) से जुड़ी हैं, पिछले 17 महीनों से बिना मानदेय सरकारी अनाज गोदाम में काम कर रही हैं।
ये महिलाएं अंत्योदय योजना के तहत रोज़ाना हजारों अनाज की बोरियां तैयार करती हैं, जिससे गरीबों को अन्न मुहैया कराया जाता है।
🧵 खुद के खर्च पर चल रहा काम
दीदियों ने बताया कि वे हर महीने करीब 1350 बोरी (लगभग 477 क्विंटल 20 किलो) अनाज भरती हैं।
सरकार की ओर से प्रति बोरी ₹12 मजदूरी तय है, लेकिन इतने महीनों से उन्हें कोई भुगतान नहीं मिला।
इतना ही नहीं — बोरियों को सिलने के लिए धागा, सिलाई मशीन और कंप्यूटर का खर्च भी इन्हीं महिलाओं को उठाना पड़ता है।
अब मशीनों की मेंटेनेंस और कामकाज के लिए भी उन्हें कर्ज पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
💬 “महाजनी कर्ज से चल रहा गुजर-बसर” – उषा देवी
समूह की सदस्य उषा देवी ने बताया,
“हम लोग महाजनी कर्ज लेकर बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च चला रहे हैं।
गोदाम तक आने-जाने का किराया भी उधार करना पड़ता है।”
उनके साथ रीना देवी, कांति देवी, मीना देवी, क्रांति देवी, किस्मतिया देवी और शारदा कुंवर ने भी यही दुख साझा किया।
🚫 स्वावलंबन की राह में रुकावट
इन महिलाओं ने रोजगार की उम्मीद में इस कार्य से जुड़कर स्वावलंबी बनने का सपना देखा था,
लेकिन समय पर मानदेय न मिलने से अब उनका सपना कर्ज और निराशा में बदल गया है।
दीदियों का कहना है कि
“अब कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है, और काम करने की हिम्मत भी टूटने लगी है।”
🙏 सरकार से अपील – मानवीय संवेदना दिखाएं
समूह ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार से अपील की है कि
मानवीय संवेदना दिखाते हुए जल्द से जल्द 17 महीने के बकाये मानदेय का भुगतान किया जाए,
ताकि ये महिलाएं अपने कर्ज चुका सकें और परिवार का भरण-पोषण सम्मानपूर्वक कर सकें।
📌 निष्कर्ष:
सरकारी दावों के बीच गढ़वा की ये सच्चाई एक कटु प्रश्न उठाती है —
जब गरीबों को अन्न बांटने वाली महिलाएं खुद भूखी हैं,
तो क्या वाकई योजनाओं का लाभ उन्हें मिल पा रहा है जो इन्हें “सफल” बनाती हैं?


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