G-Z76GJ3VQ65 google-site-verification=W_bCfRqm-7eEfZBB6vSer72kEdpHDdfo3Yo0LPoPog0 संभल में मकान और मस्जिद पर लाल निशान: प्रशासन की कार्रवाई से खौफ में लोग - BAHORA NEWS

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संभल में मकान और मस्जिद पर लाल निशान: प्रशासन की कार्रवाई से खौफ में लोग

संभल में मकानों और मस्जिद पर लाल निशान

उत्तर प्रदेश का संभल जिला एक बार फिर चर्चा में है। यहाँ प्रशासन ने तालाब की जमीन पर बने 40 मकानों और एक पुरानी मस्जिद पर लाल निशान लगा दिया है। इन निशानों का मतलब है कि प्रशासन ने इन्हें अतिक्रमण माना है और अब कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। लोगों को 15 दिन की मोहलत दी गई है कि वे अपने कागजात दिखाकर यह साबित करें कि उनका मकान या धार्मिक स्थल वैध जमीन पर बना है।

लेकिन इस कदम से इलाके में भय और तनाव का माहौल है। मकानों पर लाल निशान देखने के बाद लोग डरे हुए हैं कि कहीं बुलडोजर चलकर उनका आशियाना न उजाड़ दे।


👉 लाल निशान क्यों लगाए गए?

स्थानीय प्रशासन के अनुसार, संभल के भौराबारी इलाके में 8 बीघा तालाब की जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया गया था। इस जमीन पर धीरे-धीरे मकान, दुकान और यहां तक कि एक मस्जिद भी बना दी गई।

तालाब की जमीन सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है और सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट पहले भी साफ आदेश दे चुके हैं कि तालाब और जल स्रोत की जमीन पर कोई भी निर्माण अवैध माना जाएगा।

इसी आदेश के आधार पर प्रशासन ने चिन्हित निर्माण पर लाल निशान लगाया है।


👉 40 मकान और एक मस्जिद पर कार्रवाई

प्रशासन की रिपोर्ट के अनुसार —

  • लगभग 40 मकान तालाब की जमीन पर बने पाए गए।

  • एक पुरानी मस्जिद भी इसी दायरे में आती है।

  • सभी पर लाल पेंट से निशान लगाकर नोटिस चिपकाया गया है।

लोगों को कहा गया है कि 15 दिन में दस्तावेज़ लेकर सामने आएं। अगर कोई मकान मालिक अपनी जमीन वैध साबित कर देता है तो कार्रवाई रुक जाएगी, अन्यथा सभी अवैध निर्माण पर बुलडोजर चलाया जाएगा।


👉 लोगों में डर और बेचैनी

लाल निशान लगने के बाद इलाके में तनाव है। कई परिवारों की महिलाओं ने मीडिया से बात करते हुए कहा —

  • “हमने मेहनत की कमाई से घर बनाया है, अब इसे तोड़ दिया जाएगा तो हम कहाँ जाएंगे?”

  • “यहाँ सालों से लोग रह रहे हैं, अचानक प्रशासन कैसे कह सकता है कि यह तालाब की जमीन है?”

  • “हमारे पास भी कुछ कागजात हैं, लेकिन अगर उन्हें फर्जी बता दिया गया तो सबकुछ बर्बाद हो जाएगा।”

खासकर मस्जिद पर लाल निशान लगने से मामला संवेदनशील हो गया है। धार्मिक भावनाएँ जुड़ने के कारण तनाव बढ़ने का डर है।


👉 प्रशासन का पक्ष

जिला प्रशासन का कहना है कि —

  • अवैध कब्जा किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

  • तालाब की जमीन को खाली कराकर उसका पुनर्निर्माण कराया जाएगा।

  • 15 दिन की मोहलत इसलिए दी गई है ताकि लोग अदालत या राजस्व रिकॉर्ड से अपनी जमीन का प्रमाण ला सकें।

प्रशासन का दावा है कि यह कार्रवाई पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत की जा रही है।


👉 बुलडोजर की राजनीति और विवाद

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ सालों में बुलडोजर राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया है।

  • सरकार का कहना है कि यह कदम कानून-व्यवस्था और अवैध कब्जे हटाने के लिए उठाया जा रहा है।

  • वहीं विपक्ष का आरोप है कि बुलडोजर का इस्तेमाल चुनिंदा समुदायों और गरीब तबकों के खिलाफ किया जाता है।

संभल का यह मामला भी अब राजनीति के घेरे में आ सकता है।


👉 कानूनी पहलू

कानून के मुताबिक —

  • तालाब और जल स्रोत की जमीन को “कमन लैंड” कहा जाता है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि इन पर कोई भी निर्माण अवैध होगा और उसे हटाना ही पड़ेगा।

  • अगर प्रशासन ने पहले नजरअंदाज करके लोगों को बसने दिया, तो यह उसकी गलती है।

  • लेकिन कानून की नजर में गलत निर्माण को सही नहीं माना जा सकता।

इसलिए प्रशासन का कदम कानूनी रूप से मजबूत दिखता है।


👉 लोगों के विकल्प

लाल निशान लगाए गए परिवारों के पास अब केवल कुछ ही विकल्प हैं —

  1. अपने पास मौजूद जमीन के कागजात प्रशासन के सामने पेश करें।

  2. अदालत का दरवाजा खटखटाएँ और स्टे ऑर्डर लें।

  3. अगर अवैध कब्जा साबित हो गया तो मुआवजे की लड़ाई लड़ें।


👉 सामाजिक और धार्मिक असर

मस्जिद पर लाल निशान लगने के बाद यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं रहा, बल्कि धार्मिक और सामाजिक रूप ले चुका है।

  • स्थानीय लोग इसे धार्मिक स्थल से जुड़ा मुद्दा मानकर विरोध कर सकते हैं।

  • प्रशासन पर भी दबाव है कि वह इस कार्रवाई को शांति से निपटाए।


👉 निष्कर्ष

संभल में मकान और मस्जिद पर लगे लाल निशान ने सैकड़ों परिवारों को चिंता और डर में डाल दिया है।
प्रशासन अपने कदम को कानूनसम्मत बता रहा है, जबकि लोग इसे अन्याय मान रहे हैं।
अब सबकी निगाहें 15 दिन बाद पर टिकी हैं, जब तय होगा कि इन मकानों और मस्जिद पर बुलडोजर चलेगा या लोग अपने कागजात साबित कर देंगे।

👉 इस खबर पर आपकी क्या राय है?
क्या प्रशासन का कदम सही है या लोगों को ज्यादा समय और विकल्प दिए जाने चाहिए?
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Writer -Ritesh yadav 

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