गांधी हत्याकांड: नाथूराम गोडसे की विवादित कोर्ट स्पीच और उसका पूरा सच
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| Image Source: Wikimedia Commons |
भारतीय इतिहास में 30 जनवरी 1948 एक ऐसा दिन है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। इस दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई थी। हत्यारा था नाथूराम गोडसे।
गोडसे ने अदालत में स्वीकार किया कि उसने गांधी की हत्या की और अपने फैसले को सही ठहराने के लिए उसने एक लंबा भाषण दिया। यही भाषण आज भी चर्चा का विषय बना रहता है।
नाथूराम गोडसे कौन था?
नाथूराम विनायक गोडसे का जन्म 1910 में पुणे ज़िले के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ।
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शुरुआती दिनों में वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ा।
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बाद में हिंदू महासभा की राजनीति में सक्रिय हुआ।
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वह खुद को पत्रकार और विचारक मानता था।
गोडसे का मानना था कि गांधी की नीतियां देश को कमजोर कर रही थीं और हिंदुओं के अधिकारों की अनदेखी हो रही थी।
गांधी हत्या की घटना
30 जनवरी 1948 को बिड़ला भवन, नई दिल्ली में गांधीजी प्रार्थना सभा के लिए जा रहे थे। तभी नाथूराम गोडसे ने उनके पास जाकर पिस्तौल से तीन गोलियां दाग दीं।
गांधीजी गिर पड़े और वहीं उनका निधन हो गया। पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई।
अदालत का मुकदमा
हत्या के बाद गोडसे को गिरफ्तार कर लिया गया।
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दिल्ली की विशेष अदालत में उस पर मुकदमा चला।
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गोडसे ने न तो अपराध से इनकार किया और न ही अपने फैसले पर पछतावा जताया।
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बल्कि उसने साफ कहा कि उसने यह कदम सोच-समझकर और राष्ट्रहित में उठाया।
गोडसे की कोर्ट स्पीच
गोडसे की स्पीच लगभग 100 पन्नों की थी। इसमें उसने कई तर्क दिए:
1. गांधी की नीतियों पर आरोप
गोडसे ने कहा कि गांधीजी हमेशा मुसलमानों को खुश करने में लगे रहते थे। उनका हर फैसला हिंदुओं के खिलाफ और मुस्लिमों के पक्ष में होता था।
2. विभाजन और हिंसा
गोडसे ने गांधी को भारत के विभाजन का ज़िम्मेदार ठहराया। उसका कहना था कि पाकिस्तान बनने के बाद लाखों हिंदू मारे गए और उनकी पीड़ा को गांधी ने अनदेखा किया।
3. अहिंसा की आलोचना
गोडसे का कहना था कि गांधी की अहिंसा ने हिंदुओं को कमजोर बना दिया। देश को ताकतवर नेतृत्व चाहिए था, लेकिन गांधी के सिद्धांतों ने भारत को असुरक्षित कर दिया।
4. खुद को राष्ट्रभक्त बताना
गोडसे ने कहा कि वह गांधी का सम्मान करता था, लेकिन उसकी नीतियों से असहमत था। उसने दावा किया कि उसका कदम राष्ट्रभक्ति से प्रेरित था।
अदालत पर असर
इतिहासकारों का कहना है कि गोडसे की स्पीच ने अदालत को कुछ देर के लिए भावुक कर दिया।
कहा जाता है कि एक जज की आंखों में आंसू भी आ गए थे।
लेकिन अदालत ने कानून और न्याय के आधार पर फैसला सुनाया।
अदालत का फैसला
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नाथूराम गोडसे और उसके साथी नारायण आप्टे को फांसी की सजा सुनाई गई।
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15 नवंबर 1949 को अंबाला जेल में दोनों को फांसी दी गई।
समाज में गोडसे की छवि
गोडसे को लेकर समाज आज भी दो हिस्सों में बंटा है।
गोडसे समर्थकों की राय
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गांधीजी ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिलवाए, यह देशहित में नहीं था।
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गांधी हमेशा मुसलमानों का पक्ष लेते थे।
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गोडसे ने हिंदू समाज की रक्षा के लिए यह कदम उठाया।
गांधी समर्थकों की राय
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गांधीजी ने सत्य और अहिंसा का रास्ता दिखाया।
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गोडसे का कदम लोकतंत्र और मानवता के खिलाफ था।
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हत्या किसी भी हाल में सही ठहराई नहीं जा सकती।
गोडसे की स्पीच का ऐतिहासिक महत्व
गोडसे की स्पीच सिर्फ एक हत्यारे का बयान नहीं, बल्कि उस दौर की राजनीति और समाज की झलक भी है।
इससे पता चलता है कि आज़ादी के बाद देश किन चुनौतियों से जूझ रहा था।
आज के दौर में गोडसे
हर साल 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) और 30 जनवरी (गांधी पुण्यतिथि) को सोशल मीडिया पर गोडसे का नाम ट्रेंड करता है।
उसकी स्पीच को लेकर बहस छिड़ जाती है –
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कुछ लोग उसे हीरो मानते हैं।
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कुछ लोग उसे खलनायक करार देते हैं।
निष्कर्ष
नाथूराम गोडसे की कोर्ट स्पीच इतिहास का ऐसा दस्तावेज है जो हमें बताता है कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया कितनी जटिल थी।
एक तरफ गांधी का अहिंसक रास्ता था, दूसरी ओर गोडसे की कट्टर सोच।
इन दोनों के बीच भारत का लोकतंत्र मजबूत हुआ और हमें यह सीख मिली कि विचारधाराओं की लड़ाई का हल संवाद है, हत्या नहीं।
❓ FAQ Section
1. गांधी की हत्या कब हुई थी?
30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली के बिड़ला भवन में।
2. गांधी की हत्या किसने की थी?
नाथूराम गोडसे ने।
3. गोडसे को क्या सजा मिली थी?
फांसी की सजा, जो 15 नवंबर 1949 को दी गई।
4. गोडसे की कोर्ट स्पीच क्यों चर्चित है?
क्योंकि उसने अपने अपराध को न्यायोचित ठहराने के लिए एक लंबा तर्क दिया, जिसे आज भी समर्थक और विरोधी दोनों उद्धृत करते हैं।
5. क्या गोडसे की स्पीच जनता तक पहुंचाई गई थी?
हाँ, बाद में यह छपकर सामने आई और आज भी विभिन्न किताबों और लेखों में उपलब्ध है।
Writer -Ritesh yadav


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