G-Z76GJ3VQ65 google-site-verification=W_bCfRqm-7eEfZBB6vSer72kEdpHDdfo3Yo0LPoPog0 कभी बेचती थी हड़िया-दारू, अब मांदर बनाकर कमा रही हजारों रुपये – सिमडेगा की प्रेरक कहानी - BAHORA NEWS

Breaking News

कभी बेचती थी हड़िया-दारू, अब मांदर बनाकर कमा रही हजारों रुपये – सिमडेगा की प्रेरक कहानी

कभी बेचती थी हड़िया-दारू, अब मांदर बनाकर आत्मनिर्भर बनीं सीता देवी – सिमडेगा की प्रेरक कहानी

सिमडेगा की सीता देवी: हड़िया छोड़ मांदर बनाकर आत्मनिर्भर बनीं
फोटो क्रेडिट: हेमंत सोरेन का आधिकारिक Twitter/X अकाउंट (@HemantSorenJMM)

हमारे देश के ग्रामीण इलाकों में अक्सर गरीबी, बेरोजगारी और संसाधनों की कमी लोगों को ऐसे काम करने पर मजबूर कर देती है, जिनमें सामाजिक असहजता और असुरक्षा दोनों जुड़ी होती हैं। झारखंड जैसे राज्यों में अब भी कई परिवार जीविका चलाने के लिए हड़िया और देसी शराब बनाने का काम करते हैं। यह काम भले ही अस्थायी आमदनी का जरिया बन जाए, लेकिन इसके परिणाम अक्सर परिवार और समाज दोनों के लिए नकारात्मक होते हैं।

इसी कठिन परिस्थिति से गुजर रही थीं सिमडेगा जिले के पा करटांड़ प्रखंड की सिकरियाटांड़ पंचायत के सोगड़ा गांव की सीता देवी। कभी वह भी मजबूरी में हड़िया और शराब बेचती थीं। लेकिन आज उनकी कहानी पूरे समाज के लिए मिसाल है। उन्होंने सरकारी योजना और महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़कर न सिर्फ अपनी जिंदगी बदली बल्कि गांव की महिलाओं को भी एक नई दिशा दी।


कठिनाइयों से भरा जीवन

सीता देवी का जीवन कभी बेहद कठिन था। उनके पति खेती-बारी से परिवार का पूरा खर्च नहीं चला पाते थे। ऐसे में घर चलाने की जिम्मेदारी का बोझ उनके कंधों पर भी आ गया।

  • सीता देवी ने हाट-बाजार और अपने घर से हड़िया और देसी शराब बेचना शुरू किया

  • इस काम से थोड़ी बहुत कमाई होती थी, लेकिन माहौल अच्छा नहीं रहता था।

  • शराब पीने वाले लोग अक्सर झगड़ा करते और कई बार पैसे भी नहीं चुकाते थे।

  • आर्थिक संकट तो था ही, लेकिन साथ ही सम्मान और आत्मविश्वास की कमी भी उन्हें महसूस होती थी।

धीरे-धीरे सीता देवी इस जीवन से तंग आ गईं और सोचने लगीं कि आखिर कब तक इसी तरह जीना होगा।


2022 में आया नया मोड़

साल 2022 सीता देवी की जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। उसी साल वह मयूर महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। इस समूह ने उन्हें कई सरकारी योजनाओं की जानकारी दी।

इसी दौरान उन्हें पता चला कि झारखंड सरकार महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए फूलो-झानो आशीर्वाद योजना चला रही है। इस योजना का उद्देश्य था कि जो महिलाएं हड़िया-दारू या नशे से जुड़े कारोबार में हैं, उन्हें उससे बाहर निकालकर सम्मानजनक रोजगार दिया जाए।

सीता देवी ने इस योजना का लाभ लेने का फैसला किया।


फूलो-झानो आशीर्वाद योजना का लाभ

  • सीता देवी ने इस योजना से 10,000 रुपये का ऋण लिया।

  • उन्होंने सोच-समझकर इस पैसे का इस्तेमाल मांदर बनाने के काम में किया।

  • मांदर झारखंड और आस-पास के राज्यों में परंपरागत वाद्य यंत्र है, जिसका इस्तेमाल खासकर आदिवासी समाज के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में होता है।

इस नए काम की शुरुआत ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।


मांदर बनाने का सफर

मांदर बनाना आसान काम नहीं है। इसके लिए धैर्य, हुनर और मेहनत की जरूरत होती है।

  • सीता देवी ने गांव के कारीगरों से यह कला सीखी।

  • उन्होंने अलग-अलग आकार और डिजाइन के मांदर बनाने शुरू किए।

  • शुरुआत में उन्हें मार्केट तलाशने में मुश्किल हुई, लेकिन धीरे-धीरे उनके बनाए मांदर की मांग बढ़ने लगी

  • आज वह हर महीने लगभग 10 हजार रुपये की कमाई कर रही हैं।

इस काम में उनके पति जयधनी नायक भी बराबर हाथ बंटाते हैं।


आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की ओर कदम

जहां पहले सीता देवी को हड़िया-दारू बेचने में शर्म महसूस होती थी, अब मांदर बनाकर वह गर्व के साथ अपनी मेहनत की कमाई करती हैं।

  • उनकी आमदनी स्थायी हो गई है।

  • समाज में उन्हें सम्मान की नजर से देखा जाता है।

  • उनका आत्मविश्वास पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुका है।

  • बेटी की पढ़ाई और परिवार का भरण-पोषण अच्छे से हो रहा है।


खेती-बारी से अतिरिक्त आय

सीता देवी सिर्फ मांदर बनाने तक सीमित नहीं हैं। वह अपने पति के साथ खेती-बारी में भी हाथ बंटाती हैं।

  • खेतों से अनाज और सब्जियां मिल जाती हैं।

  • अतिरिक्त उपज बाजार में बेचकर कुछ और आमदनी हो जाती है।

  • इससे परिवार की आर्थिक स्थिति और मजबूत हो गई है।


बेटी के लिए बेहतर भविष्य

सीता देवी की एक बेटी है, जिसने हाल ही में इंटर पास किया है। अब वह चाहती हैं कि उनकी बेटी उच्च शिक्षा हासिल करे और किसी अच्छी नौकरी तक पहुंचे।

यह बदलाव इसलिए संभव हुआ क्योंकि सीता देवी ने अपनी सोच बदली और सही अवसर का उपयोग किया।


समाज के लिए प्रेरक मिसाल

सीता देवी की कहानी सिर्फ उनके परिवार तक सीमित नहीं है। आज उनका उदाहरण आसपास की कई महिलाओं को प्रेरित कर रहा है।

  • महिलाएं उनसे सीख रही हैं कि सही योजना और मेहनत से जिंदगी बदली जा सकती है।

  • गांव की अन्य महिलाएं भी स्वयं सहायता समूह से जुड़ रही हैं।

  • धीरे-धीरे हड़िया और शराब का कारोबार करने वाली महिलाएं भी सम्मानजनक काम की ओर कदम बढ़ा रही हैं।


विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

ग्राम संगठन के सदस्यों का कहना है कि फूलो-झानो आशीर्वाद योजना ने सैकड़ों महिलाओं को नशे से जुड़े धंधे से बाहर निकाला है।

विशेषज्ञों का मानना है कि –

  • ऐसे प्रयास न सिर्फ महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देते हैं, बल्कि समाज में नशे की लत को भी कम करते हैं।

  • महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर गांव की आर्थिक स्थिति में भी सुधार लाया जा सकता है।


भविष्य की योजना

सीता देवी अब चाहती हैं कि वह अपने काम को और आगे बढ़ाएं।

  • उनका सपना है कि गांव की और महिलाएं उनके साथ मिलकर मांदर बनाने का काम करें।

  • वह चाहती हैं कि इस पारंपरिक वाद्य यंत्र को पूरे देश और दुनिया तक पहुंचाया जाए।

सिमडेगा की सीता देवी ने यह साबित किया है कि जीवन कितना भी कठिन क्यों न हो, सही फैसले और मेहनत से सबकुछ बदला जा सकता है।

कभी वह मजबूरी में हड़िया-दारू बेचती थीं, लेकिन आज वह मांदर बनाकर हर महीने हजारों रुपये कमा रही हैं और समाज में एक सम्मानजनक पहचान बना चुकी हैं।

उनकी यह सफलता सिर्फ व्यक्तिगत कहानी नहीं है, बल्कि यह महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भर भारत की ओर बढ़ता एक कदम है।


Writer -Ritesh yadav 

कोई टिप्पणी नहीं